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प्रेम और जंग में सब जायज है Hindi Story

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प्रेरणादायक हिंदी कहानी Hindi Kahani

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महाभारत का युद्ध चल रहा था। भीष्म पितामह कौरवों की सेना का नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ युद्धमें आचार्य द्रोण, दानवीर कर्ण तथा कई अन्य वीर योद्धा थे।

कौरवों की विशाल सेना को देखकर युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा, “हे कृष्ण! इतनी बड़ी सेना को हम युद्ध में कैसे पराजित कर पाएंगे?”

इस पर श्रीकृष्ण ने उनसे पूछा, “क्या तुम्हें अपने युद्ध-कौशल पर भरोसा नहीं है? तुम भीम तथा अर्जुन जैसे महान योद्धाओं को कैसे कम महत्त्व दे सकते हो ?’

युधिष्ठिर ने कहा, “हे कृष्ण! आप हमारी परम शक्ति हैं।’

श्रीकृष्ण ने पांडवों को भीष्म पितामह के पराक्रम की याद दिलाई और एक युक्ति सुझाई।

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श्रीकृष्ण ने कहा, “राजा द्रुपद का पुत्र शिखंडी एक ‘किन्नर’ है। हम शिखंडी को कल के युद्ध में सेनापति बनाकर भीष्म पितामह के विरुद्ध खड़ा कर देंगे। भीष्म पितामह शिखंडी से युद्ध नहीं करेंगे। इस स्थिति में वे अपने अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाएंगे। इस तरह उन्हें आसानी से पराजित किया जा सकता है।’

श्रीकृष्ण की यह युक्ति काम आ गई। पितामह पराजित हो गए। गुरु द्रोणाचार्य ने सेनापति का कार्य-भार संभाल लिया। उन्होंने कौरव सेना को बड़ी ही निपुणता से संगठित किया। पांडवों को विरोधी सेना से युद्ध करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। उनकी सेना को बहुत क्षति हुई थी।

युधिष्ठिर ने बड़े ही दुखी मन से कहा कि वे युद्ध में कभी नहीं जीत सकेंगे।

यह सुनकर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “यह एक कायरतापूर्ण विचार है। हमें जीत की कोई-न-कोई राह अवश्य ही मिल सकती है।’ युधिष्ठिर ने कहा, “हे कृष्ण! आज्ञा दें। हमें क्या करना चाहिए।’

श्रीकृष्ण ने कहा, “युधिष्ठिर, तुम ‘धर्मपुत्र’ हो। सब लोग जानते हैं कि तुम कभी झूठ नहीं बोलते। अगर तुम एक युक्ति करने के लिए सहमत हो। जाओ तो हम गुरु द्रोणाचार्य को युद्ध में हरा सकते हैं।’

युधिष्ठिर ने पूछा, “वह कैसे?”

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श्रीकृष्ण ने कहा, “हे युधिष्ठिर! तुम एक हाथी को पकड़कर लाओ। उस हाथी का नाम द्रोणाचार्य के पुत्र ‘अश्वत्थामा’ के नाम पर रख दो। फिर उस हाथी का वध करके घोषणा कर दो कि अश्वत्थामा युद्ध में मारा गया है।’

युधिष्ठिर ने इस कथन पर असहमति व्यक्त करते हुए कहा, “हे कृष्ण! ऐसा करना तो असत्य-भाषण होगा।’

श्रीकृष्ण ने कहा, “नहीं, यह कदापि असत्य नहीं होगा। तुम यह घोषणा करते हुए ‘कुंजर’ (हाथी) शब्द को भी अंत में जोड़ दोगे, लेकिन जब तुम ‘कुंजर’ शब्द की घोषणा करोगे, तब ढोल-नगाड़े इतने जोर से बजाए जाएंगे कि द्रोणाचार्य को केवल शुरू के दो शब्द ‘अश्वत्थामा हतोहंता’ ही सुनाई पड़ेंगे। अपने पुत्र की मृत्यु के समाचार को सुनकर द्रोणाचार्य युद्ध करना छोड़ देंगे। फिर तुम उन्हें आसानी से युद्ध में पराजित कर सकोगे ।।’

कुछ देर सोचने के पश्चात युधिष्ठिर ने इस कथन का विरोध किया और कहा कि यह ठीक नहीं है। इस पर श्रीकृष्ण ने तर्क दिया कि ‘प्रेम और जंग’ में सब जायज है।

युधिष्ठिर ने इच्छा न होते हुए भी हामी भर दी। इस युक्ति को अंजाम दिया गया। द्रोणाचार्य का युद्धभूमि में वध कर दिया गया। इस प्रकार पांडवों को अपनी जीत में बाधक बन रहे द्रोणाचार्य जैसे महान योद्धा से मुक्ति मिल गई।

शिक्षा : इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती हैं कि शत्रु को अगर पराजित करना हो तो उसे उसी की चाल से ही सात देनी चाहिए/

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