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सूरत से सीरत का अंदाजा नहीं होता : Hindi Story

हिंदी कहानी
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Motivational Hindi Story, Inspirational Hindi Kahani 

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प्रेरणादायक हिंदी कहानी 

शाहजहां के सबसे बड़े बेटे दारा की बेगम रणदिल थी। दारा उस राज्य का सही उत्तराधिकारी था, परंतुउसकी भावी शासक बनने की सारी आशाएं धूमिल हो गईं, क्योंकि उसके भाई औरंगजेब ने बगावत कर दी थी। दारा इस बगावत को कुचलना चाहता था। दोनों इस बात से अवगत थे कि यह बगावत की जंग उनके अंत का कारण बनेगी।

इस युद्ध में औरंगजेब विजयी रहा। दारा मारा गया। दारा की मौत की खबर जब रणदिल के पास पहुंची तो वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसने तो जैसे अपना सब कुछ ही खो दिया था।

आगरा लौटते ही औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को आगरा किले में बंदी बना लिया तथा सारा राज-पाट अपने अधिकार में कर लिया। औरंगजेब ने सोचा कि सारा राज-पाट तो अब उसका हो ही चुका है, अब रणदिल पर भी अधिकार प्राप्त कर लिया जाए।

औरंगजेब ने अपनी एक दासी द्वारा रणदिल को यह प्रस्ताव भेजा कि वह उसकी बेगम बनकर रहे। दासी ने रणदिल से उसका प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए कहा और कहा कि वह जवान तथा सुंदर है और अगर वह औरंगजेब की बेगम बन गई तो उसे ताउम्र ऐश-ओ-आराम की जिन्दगी नसीब होगी, परंतु रणदिल ने औरंगजेब का यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। दासी वापस लौट आई। औरंगजेब को पूरी घटना का वृत्तांत सुनाया।

औरंगजेब ने दासी को फिर से रणदिल के पास जाने का आदेश दिया और उससे यह कहने को कहा कि वे उसके बिना जी नहीं सकते। उसमें एक जादुई आकर्षण है। उसकी आंखें चमकीली हैं। उसका गोरा शरीर बहुत सुंदर है। औरंगजेब उसकी प्रशंसा करने लगा।

औरंगजेब की दासी दोबारा रणदिल के पास गई तथा उसे औरंगजेब का प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए कहा। इस पर रणदिल जोर-जोर से हंसने लगी और कहा, “तुम्हारे राजा कहते हैं कि मेरा चेहरा मेरी तकदीर है। क्या यह सच है? मुझे देखना चाहिए।’ यह कहकर रणदिल ने दासी को रुकने का इशारा किया और वह अपने शयनकक्ष में बने दर्पण की ओर दौड़ पड़ी। वह अपना चेहरा दर्पण के समक्ष निहारने लगी और कहने लगी, “सचमुच मेरा चेहरा बहुत सुंदर है, लेकिन अब मुझे इस सुंदरता की कोई आवश्यकता नहीं है।’ रणदिल ने एक छुरा उठाया तथा अपने गालों पर उससे जोर-जोर से वार करने लगी। खून से लथपथ वह दासी के पास गई। उसने खून को अपने दुपट्टे से पोंछा तथा उसे उस दासी को देते हुए कहा, “इस खून से लथपथ दुपट्टे को तुम जाकर अपने राजा औरंगजेब को दे देना और कहना कि अब मेरा चेहरा सुंदर नहीं रहा। यह सुंदर चेहरा सिर्फ मेरे प्रिय पति दारा के लिए ही था। इस पर और किसी का अधिकार नहीं है। इसलिए मैंने इसे नष्ट कर दिया है। अब मेरा चेहरा खून से लथपथ है। शीघ्र ही मेरे चेहरे पर दाग-धब्बे बन जाएंगे।”

रणदिल का लहूलुहान चेहरा दासी से देखा न गया। कुछ देर के लिए तो उसकी बोलती ही बंद हो गई। बाद में अपने-आप को किसी तरह संभालते हुए दासी ने रणदिल से कहा, “आप महान हैं! हे साहसी बेगमसाहिबा! अगर शहंशाह दारा आज जिंदा होते तो उन्हें आप पर तथा आपकी वफादारी पर नाज होता।’

दासी के चले जाने पर रणदिल उसे तब तक देखती रही, जब तक कि दासी आंखों से ओझल नहीं हो गई। फिर वह अपने शयनकक्ष की ओर दुखी मन से लौट गई तथा बिस्तर पर लेटकर रोने लगी। इस प्रकार रणदिल के इस साहसी कारनामे से औरंगजेब असमंजस में पड़ गया तथा जब उसे रणदिल द्वारा भिजवाया गया संदेश मिला कि “सूरत से सीरत का अंदाज़ा नहीं होता’, तो उसकी आंखें खुली की खुली रह गई। उसके बाद औरंगजेब ने कभी भी रणदिल को परेशान नहीं किया।

शिक्षा : इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती हैं कि हमें किसी के बाह्य आकर्षण को उसकी सुंदरता का पैमाना नहीं मानना चाहिए अपितु हमें उसके मन की सुंदरता को परखना चाहिए/ तभी हम उस व्यक्ति-विशेष की सही तरह से पहचान कर पाएंगे/

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