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सफलता कैसे पायें : जल्दी का काम शैतान का

hindi storyदोस्तों जैसा की आप जानते मैं इस वेबसाइट जो भी कहानी डालता हु वो रियल घटना पर आधारित होती है तो उसी सीरीज में एक और जिदंगी बदल देनी वाली कहानी – 

Life Changing Hindi Story. Very Very Motivational story for Success. If you want to get success in your life then read it. 

सफलता की कहानी, Saflta Ki Kahani. 

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जल्दी का काम शैतान का

मराठा सैनिकों के प्रमुख शिवाजी मुगलों के साथ युद्ध में पराजित हो गए थे, इसलिए वे अपने निकट सहयोगियोंके साथ युद्धभूमि से पलायन कर गए। वे सब जंगल के रास्ते आगे की ओर जाने लगे। काफी दूरी तय करने के बाद वे एक पड़ाव पर पहुंचे। शिवाजी ने अपने सहयोगियों से कहा, “अगर हम सब एक साथ समूह बनाकर चलेंगे तो हमें पहचान लिया जाएगा, इसलिए हम सबको अलग-अलग रास्तों पर चलना चाहिए। हम सब तीन दिन बाद राजगढ़ किले के समीप वाले पुराने विश्राम-गृह में फिर से एकत्र होंगे।’

शिवाजी के सहयोगियों ने उनकी इस बात का विरोध किया, परंतु शिवाजी ने उनके इस विरोध को नहीं स्वीकारा। वे अकेले ही अपने रास्ते पर चल पड़े। शाम होते-होते वे बहुत थक चुके थे। उन्हें रात्रि के लिए भोजन तथा विश्राम की आवश्यकता थी। दूर कहीं उन्हें एक दीपक जलता हुआ नज़र आया। इसे देख उनकी आशाएं जाग्रत हुई। वे जल्दी से उस ओर चल पड़े और जल्दी ही एक झोपड़े के पास जा पहुंचे।

उस झोपड़े में एक बूढ़ी महिला आग पर खाना पका रही थी। शिवाजी के कदमों की आहट सुनकर उसने अपना सिर उठाया। उसने एक अनजान व्यक्ति को अपने दरवाजे पर खड़े देखा। बुढ़िया ने उस व्यक्ति से अपना परिचय देने को कहा। शिवाजी ने अपना सही परिचय नहीं दिया क्योंकि उन्हें उसकी ओर से खतरा ही नज़र आ रहा था। शिवाजी ने अपने-आपको एक गरीब मुसाफिर बताया और कहा कि वे बहुत भूखे हैं। वे सुबह से ही पैदल चल रहे हैं। सारे दिन में उन्होंने थोड़े से फल ही खाए हैं। बूढ़ी महिला ने विनम्र भाव से शिवाजी को बैठने के लिए कहा, और कहा कि वह उनके भोजन के लिए उबाली हुई मकई लेकर आ रही है। उसने अपनी गरीबी के कारण शिवाजी को बढ़िया भोजन खिलाने में असमर्थता जताई।

शिवाजी ने उसका धन्यवाद किया और मुंह-हाथ धोकर खाने के लिए बैठ गए। बूढ़ी महिला ने उनके सामने एक प्लेट रखी तथा गरमा-गरम भोजन परोसा। शिवाजी ने प्लेट से मुट्टी-भर कर उबली मकई उठानी चाही, लेकिन हाथ में दर्द और खाना गरम होने की वजह से वे कराह उठे तथा जल्दी से मकई वापस प्लेट में रख दी और उसके ठंडा होने का इंतजार किया।

बूढ़ी महिला, जो उन्हें देख रही थी, ने कहा कि वे बिल्कुल महाराज शिवाजी की तरह लगते हैं। शिवाजी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, ‘‘शिवाजी की तरह, क्यों?’

बूढ़ी महिला ने जवाब दिया, ‘शिवाजी छोटे किलों को छोड़ बड़े किलों पर कब्जा करने में लगे रहते हैं। वे बेहद जल्दबाजी करते हैं। वे नहीं जानते कि उन्हें चरणबद्ध तरीके से पहले छोटे किलों पर कब्जा करना चाहिए तथा बाद में बड़े किलों पर कब्जा करना चाहिए। जल्दबाजी में नुकसान उठाना पड़ता है। इससे मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। तुमने भी जल्दबाजी की। गरम परोसा खाना पहले किनारों पर ठंडा होता है और बाद में मध्य से ठंडा होता है। तुमने किनारे से खाना उठाने की बजाय बीच में से खाना उठाया, इसलिए तुम्हारी उंगलियां जल गई।’

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शिवाजी को उस बूढ़ी महिला से एक बहुत बड़ी सीख मिल गई थी। उन्होंने आराम से भोजन किया तथा तब तक रुके रहे जब तक कि उस बूढ़ी महिला ने भी भोजन नहीं कर लिया। शिवाजी ने बरतनों को धोने में भी उस महिला का हाथ बंटाया। उसके बाद उस महिला ने शिवाजी के सोने के लिए जमीन पर चटाई बिछा दी। रातभर चटाई पर लेट कर शिवाजी ने अपनी थकान दूर की।

अगले दिन शिवाजी ने उस बूढ़ी महिला के घर से विदाई ली और कहा, “मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि आज से मैं किसी भी कार्य में जल्दबाजी नहीं करूंगा। मैं जानता हूं कि जल्दबाजी करने से कोई भी मुश्किल में पड़ सकता है। यह सबक सिखाने के लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं।’

उस बूढ़ी महिला ने खुश होकर कहा, “अच्छी बात है। मैं आशा करती हूं कि शिवाजी भी यह सबक सीखें। काश! मैं शिवाजी को संपूर्ण साम्राज्य पर अधिकार स्थापित करते हुए देख सकूं।’

शिवाजी ने तुरंत उत्तर दिया, “शिवाजी को यह सबक मिल चुका है, माताजी।” यह कहकर शिवाजी उस बूढ़ी महिला के चरणों में गिर गए। बूढ़ी महिला को शिवाजी की यह बात समझ नहीं आ रही थी।

शिवाजी ने कहा, “माताजी। मैं ही शिवाजी हूं। मुझे आशीर्वाद दीजिए। आपने मुझे जीत की राह दिखा दी है।’ शिवाजी ने उस महिला का दाहिना हाथ उठाया तथा अपने सिर पर रखा। तत्पश्चात् उस महिला ने शिवाजी को विजयी होने का आशीर्वाद दिया। उसके बाद शिवाजी अपनी राह पर चल पड़े।

शिक्षा : इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती हैं कि हमें अपना काम सही तरीके से और धेयपूर्वक करना चाहिए/ जल्दबाजी में काम बनते नहीं अपितु बिगड़ते ही हैं/ धेयपूर्वक कार्य करने से हमारे सफल होने के अवसर अधिक हो जाते हैं.

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