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गन्ने की वैज्ञानिक तरीके से खेती कैसे करें? Ganne ki Kheti Kaise Kare

ganne ki kheti

 

Agriculture of Sugarcane (Ganne ki kheri Kaise Karen) गन्ने की खेती कैसे करें?

भारत में गन्ने (Ganne) की खेती आदिकाल से की जा रही है किन्तु 20वीं शताब्दी में गन्ने (Ganne) की पहचान
एक प्रमुख नकदी फसल के रूप में की गई। भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में इसका विशेष योगदान
है। इस समय देश के लगभग 18 प्रदेशों में 42 लाख हैक्टर कृषि भू-भाग पर औसतन 70 टन प्रति
हैक्टर उपज के साथ गन्ने की खेती की जाती है। उत्तर भारत के लगभग 60-65 प्रतिशत भू-भाग
पर गन्ने की बुआई बंसतकाल में आर्द्रता जमाव और बढ़वार के अनुकूल की जाती है। इस बुआई
हेतु पूर्वी क्षेत्र जैसे पश्चिम बंगाल और बिहार राज्यों के लिए 15 जनवरी से 15 फरवरी, मध्यवर्ती ओर
पश्चिमी क्षेत्र जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब आदि राज्यों में 15 फरवरी से 15 मार्च तक
बुआई का समय उपयुक्त होता है। इसके बाद बुआई करने से गन्ने (Ganne) की फसल को समय कम मिलने
के कारण उपज में भारी कमी आ जाती है तथा क्षेत्रफल अधिक होने के कारण इसकी कम औसत
उपज का राष्ट्रीय उत्पादकता पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
भारत में ऐसे प्रमाण मिले है कि गन्ने (Ganne) की खेती ऋग्वेद काल 2500-1400 ई.पू. में भी की जाती
थी। सिकन्दर 326 ई.पू. में भारत पर आक्रमण के समय गन्ने (Ganne) की खेती का वर्णन इतिहास में मिलता
है। बारबर (ठंतइंत 1951) के मतानुसार उत्तरी भारत में पाये जाने वाले पतले गन्ने (Ganne) कांस जाति
(ैंबबींतनउ ैचवदजंदमनउ) से विकसित हुआ तथा मोटा गन्ना न्यूगुनिया (छमूहनपदमं) से
उत्पन्न हुई। ब्राण्डस (ठतंदके 1956) के अनुसार गन्ने की उत्पत्ति न्यूगुनिया से ही हुआ है। गन्ना
उत्पादन में ब्राजील, क्यूबां, पाकिस्तान, चीन मैक्सिकों, फिलिपाइप आदि प्रमुख देश है।
फसल से संतोषप्रद उपज प्राप्त करने में क्षेत्र की जलवायु, भूमि और सिंचाई सुविधओं के
आधार पर चयनित उन्नतशील प्रजातियों का विशेष महत्व है। किसी भी क्षेत्र में शीघ्र पकने वाली,
मध्य और देरी से पकने वाली प्रजातियों को क्रमषः एक निश्चित अनुपात 30ः40ः30 में ही बोना
चाहिए।
पिछले दशक में गन्ना क्षेत्रफल, उत्पादन और उत्पदकता की संयुक्त वृद्धि दर क्रमशः 1.81, 2.90 और
1.08 प्रतिशत रही है और अन्य प्रमुख खाद्य फसलों जैसे गेहूं(1.96), धान (1.21) और मक्का (1.44)
की अपेक्षा वृद्धि दर बहुत कम (1.08 प्रतिशत) रही। यह अन्य देशों जैसे ब्राजील व आस्ट्रेलिया से
कम है। इसे बढ़ाने के लिए गन्ना उत्पादन की तकनीकी में अपेक्षाकृत सुधार तथा किसनों द्वारा उनको
अपनाये जाने हेतु सार्थक प्रयासों की नितांत आवश्यकता है। प्रति ईकाई क्षेत्रफल से अधिक लाभ
प्राप्त करने के लिए अपेक्षाकृत सुधरी और परिष्कृत तकनीकों/विधियों को समावेशित किया जाना
आधुनिक युग की आवश्यकता है। भारत में गन्ने (Ganne) की फसल 3 करोड़ 62 लाख हैक्टेयर भूमि पर की
जाती है। जिसका 40-45 प्रतिशत क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश में आता है।
बीज का चुनाव और उपचार
गन्ना बीज हमेशा गन्ने (Ganne) की नर्सरी से ही लेना चाहिए। ऐसा संभव नहीं होने पर अच्छी देखरेख,
समुचित व संतुलित उर्वरक और जल प्रबंध द्वारा उगाई गई शुद्ध और निरोग, 8-10 माह पुरानी गन्ने (Ganne)
की फसल बीज गन्ने (Ganne) के लिए उपयुक्त होती है। विभिन्न बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु गन्ने (Ganne) के
टुकड़ों को नम-गर्म वायु उपचार विधि से 540 से. पर उपचारित करना चाहिए। तदोपरांत फफूंद
नाशक दवाओं जैसे एगलाल 1.23 कि.ग्रा. या एरीटान 625 ग्राम, 250 लीटर पानी में मिलाकर 1
हैक्टर हेतु बीज टुकड़ों का उपचार करना जरूरी होता है। दीमक और कंसुआ की रोकथाम के लिए
हैप्टाक्लोर 20 ई.सी. नामक दवा 6.25 लीटर प्रति हैक्टर लगभग 1000 लीटर पानी में मिलाकर गन्ने (Ganne)
के टुकड़ों को कूड़ों में रखने के बाद डालकर 7-10 सें.मी. मिट्टी की परत से ढक दिया जाता है।
देर से गन्ना बुआई की स्थिति में, अंतरालों को भरने और बीज गन्ने (Ganne) की बढ़ाने में अंतरालित
प्रतिरोपण तकनीक अत्यंत लाभकारी है। इसमें एक आंख वाली लगभग 30,000 पेडि़यों को
ऊध्र्वाधर स्थिति में 50 वर्ग मीटर के नर्सरी क्षेत्रफल में रोपित किय जाता है जो कि एक हैक्टर भूमि
में 16 ग 30 सेमी के अंतराल पर रोपण के लिए पर्याप्त होते है। नर्सरी में उगी हुई एक माह पुरानी
पौध को प्रतिरोपण प्रयोग में लाया जा सकता है।
जलवायु तथा मृदा
गन्ना उष्ण कटिबन्धीय जलवायु का पौधा है। गन्ना उन सभी स्थानों पर आसानी से उगाया
जा सकता है, जहाँ की जलवायु उष्ण कटिबन्धीय पायी जाती है। इसकी फसल समशीतोष्णीय भागों
में भी आसानी से की जा सकती है। गन्ने (Ganne) की फसल के लिए उचित तापमान 25 डिग्री से. से 32 डिग्री से. होता है। किन्तु 15 डिग्री संे. से नीचे तथा 45 डिग्री सें. से ऊपर का तापमान असहनीय
रहता है। पौधो की वृद्धि के लिए लम्बी अवधि के दिन तथा सूर्य का प्रकाश आवश्यक है। पकने
के समय मौसम शुष्क ठण्डा तथा पाले रहित होना आवश्यक है। अच्छे निकास वाली दोमट मृदा गन्ने
की फसल के लिए उचित मृदा मानी गयी है। गन्ने (Ganne) की फसल काली, देामट सिल्ट तथा बलुई सिल्ट
मृदा में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। लम्बी अवधि के दिनों में गन्ने के पौधों की कल्ले
अधिक मिलती है तथा वृद्धि भी अच्छी होती है। इस फसल को वृद्धि के लिए 50-60 प्रतिशत आद्रता
की आवश्यकता रहती है।
बुआई का समय
गन्ने (Ganne) की आंख के शीघ्र और प्रभावशाली अंकुरण हेतु गर्म किन्तु नमीयुक्त भूमि आवश्यक है।
भूमि का ताप गन्ने (Ganne) के अंकुरण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो कि 25-30 डिग्री सेंअनुकूलतम
पाया गया है। बंसतकाल में यह तापमान विभिन्न क्षेत्रों यथा पूर्वी क्षेत्र जैसे पश्चिम बंगाल
और बिहार राज्यों के लिए 15 जनवरी से 15 फरवरी, मध्यवर्ती और पश्चिमी क्षेत्र जैसे उत्तर प्रदेश,
हरियाणा और पंजाब आदि राज्यों में 15 फरवरी से 15 मार्च तक रहता है। अतः यही समय बुआई
के लिए सर्वोत्तम है।
गन्ने (Ganne) की बोआई के लिए 30000 से 40000 तीन आंख वाले स्वस्थ्य टुकड़े प्रति हैक्टर की दर
से रोपाई की जानी चाहिए। गन्ने की ऊपरी भाग को बोआई के लिए काम नहीं लिया जाता है क्योंकि
इसमें सुषुप्ता पायी जाती है।
जल प्रबंध Agriculture of Sugarcane
फसल की मांग के अनुरूप पानी की सही मात्रा उचित विधि के द्वारा समय पर फसल को
पहुंचाना तथा जल की हानि को रोकना ही जल प्रबंधन का उद्देश्य है। अन्य फसलों की अपेक्षा गन्ने (Ganne)
की फसल में अधिक पानी की आवश्यकता होती है। पूर्वी क्षेत्रों में लगभग 4-5 और पश्चिमी
क्षेत्रों में लगभग 6-8 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। सिंचाई के लिए जल सीमित मात्रा में
उपलब्ध होने पर गन्ने (Ganne) की अधिक संवदेनशील अवस्थाओं तथा गन्ने का जमाव, किल्लों का प्रस्फुटन,
शीघ्र बढ़वार और पकने की अवस्था में ही सिंचाई करनी चाहिए। यदि केवल 1, 2 या 3 ही सिंचाइयां
करनी हों तो इन्हें कल्ले प्रस्फुटन के अंतिम चक्र में ही देना चाहिए। जलभराव विधि से पूरे खेत में
पानी भरकर सिंचाई की जाती है परन्तु इस विधि से जल का काफी हृास होता है तथा खरपतवारो
को भी बढ़ावा मिलता है। एकान्तर नाली विधि से सिंचाई करने से लगभग 36 प्रतिशत पानी की बचत
के साथ-साथ उपज भी सामान्य मिलती है। इस विधि में एक पंक्ति छोड़कर प्रत्येक दूसरी पंक्ति
के बीच खाली जमीन पर 45 से.मी. चैड़ी और 15 से.मी. गहरी नाली बनाकर पानी भर दिया जाता
है। वर्षा ऋत में जलभराव रोकने के लिए समुचित जल निकास का प्रबंध करना आवश्यक है।
पोषक तत्वों का प्रबंध
गन्ने (Ganne) की फसल एक बार बुआई के पश्चात कम से कम दो वर्ष तक खेत मे रहती है। फसल
की पैदावार अन्य फसलों की तुलना में बहुत अधिक होने के कारण भूमि में पाये जाने वाले पोषक
तत्वों की आवश्यकता भी अधिक होती है। एक अनुमान के अनुसार 100 टन प्रति हैक्टर उपज वाले
गन्ने (Ganne) की फसल भूमि से 68 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 25 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 130 कि.ग्रा. पोटाश लेती
है। जिस भूमि में गन्ने की खेती करना हो उसकी जांचोपरांत ही उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए।
ज्यादातर क्षेत्रों में 120-150 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस तथा 60 कि.ग्रा. पोटाश एक
हैक्टर क्षेत्रफल में दी जाती है। फाॅस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा बुआई के समय ही डाल देनी चाहिए। नाइट्रोजन की शेष मात्रा दो बार में सिंचाई की
उपलब्धता के अनुसार वर्षा प्रारम्भ होने के पूर्व ही डाल दी जाती है। जीवाश्म की कमी को पूरा करने
के लिए हरी खाद या गोबर की खाद का उपयोग आवश्यक है।
पताव बिछाना
गन्ना जमाव के 40 दिन बाद दो पंक्तियों के बीच खाली स्थान पर पताई को परत के रूप में
बिछाने से गर्मी और सर्दी में तापमान को संतुलित रखने भूमि में जैविक क्रियाओं को सक्रिय करने
तथा पोषक तत्वों को सुगमता से उपलब्ध कराने में संतोषप्रद परिणाम प्राप्त हुए है। यह जल और
उर्वरक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ पैदावार बढ़ाने में प्रभावी सिद्ध हुई है।
खरपतवार नियंत्रण व कर्षण क्रियाएं
लम्बे समय की फसल होने के कारण गन्ने (Ganne) में लगभग सभी प्रकार के खरपतवार पाये जाते है।
उत्तर भारत में गन्ने (Ganne) की बुआई के तुरंत पश्चात पाये जाने वाले खरपतवारों में मोथा, पत्थरचट्टा,
वनचरी, कृष्णनील, बथुआ, जंगलगोभी, दुद्धी तथा वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही दूबघास, सांवा,
काकुन, पैस्पेलम आदि की संख्या बढ़ जाती है। बसंतकालीन गन्ने की बुआई के 60 दिन बाद से
लेकर 120 दिन तक अधिकतम हानि होती है। खरपतवारों की रोकथाम के लिए उचित फसल चक्र
अपनाना, भू-परिष्करण तथा प्रतिस्पर्धी फसलें और यांत्रिक विधियों आदि के अलावा रासायनिक विध्
िा भी प्रयोग में लाना आवश्यक है। इसमें एट्राजीन और सीमाजीन नामक रसायन के 2 कि.ग्रा. सक्रिय
तत्व मात्रा को लगभग 700-800 लीटर पानी में घोल बनाकर खेत में जमाव से पूर्व छिड़काव करने
से गन्ने (Ganne) के प्रमुख खरपतवार नियंत्रित हो जाते है। यदि 30-40 दिन बाद खरपतवार पुनः उग आयें
तो 2, 4-डी, नामक रसायन के डेढ़ कि.ग्रा. सक्रिय तत्व मात्रा को 800 लीटर पानी में घोलकर
छिड़काव करना उत्तम है, परन्तु एट्राजीन की उपरोक्त मात्रा के उपयोग के बाद एक गुड़ाई कर देने
से उपज में सर्वाधिक बढ़ोत्तरी पाई गई है।
गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाना
यह पाया गया है कि प्रायः सिंचाई के बाद ओट पर आने पर गुड़ाई करने से खरपतवारों पर
प्रभावी नियंत्रण के अतिरिक्त मृदा जल संरक्षण की अवधि भी बढ़ जाती है तथा पौधों को पर्याप्त
हवा और प्रकाश मिलने के कारण बढ़वार पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
गन्ने (Ganne) के पौधों पर जुलाई में मिट्टी चढ़ाने से अवांछित कल्लों का प्रस्फुटन अवरूद्ध हो जाता है
तथा खरपतवार नियंत्रण के साथ-साथ गन्ना गिरने का भय भी कम हो जाता है। इस प्रकार उपज
में बढ़ोत्तरी के अतिरिक्त गुणवत्ता में भी सुधार होता है।
अंतः फसलीय खेती
उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में बंसतकालीन गन्ने (Ganne) के साथ दलहनी फसलों (मूंग,
उड़द) की अंतः खेती को अपनाकर दलहन का लगभग 10 लाख हैक्टर अतिरिक्त क्षेत्रफल बढ़ाया
जा सकता है। गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य के स्थान में मूंग की दो पंक्तियां बोई जाती है। द्विउद्देशीय
दलहनों में गन्ना$लोबिया (पूसा कोमल हरी फली के लिए) और गन्ना$मूंग (के-851 दाल के लिए)
पद्धतियां अत्यंत लाभकारी पाई गई है। इन फसलों की फली तोड़ने के बाद पौधों को हरी अवस्था
में ही भूमि में पलट कर दबा देने से गन्ने (Ganne) को दिये जाने वाले नाइट्रोजन में 35-40 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर
की बचत भी होती है। बसंतकालीन गन्ने तथा फरवरी में शुरू किये गये पेड़ी के साथ मक्के की किस्में जैसे सूर्या और ष्वेता उपयुक्त पाई गई है। गन्ना प्रजाति का पंत 90223 की 45ः105ः45 से.मी. पंक्ति
व्यवस्था में मक्का (सूर्या) की दो पंक्तियां 105 से.मी वाले रिक्त स्थान पर बोने से 83 टन प्रति हैक्टर
गन्ना समतुल्यांक उपज प्राप्त की गई है और मक्के के भुट्टों को बेचकर अच्छी मध्यावधि आय प्राप्त
होती है। गन्ना लम्बी अवधि की फसल होने के कारण गन्ने में परिपक्वता प्रारम्भ होने के समय तथा
अत्यधिक गर्मी पड़ने के पहले इनकी फसल तैयार हो जाती है।
कीट और प्रबंधन
विभिन्न गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में लगभग 200 प्रकार के कीट पाये जाते है। इनमें दीमक, सफेद
गिडार, प्ररोह बेधक, चोटी बेधक, तना बेधक, पायरिला, काला चिकटा, सफेद मक्खी, शक्ल कीट
आदि की लगभग 2 दर्जन जातियां प्रमुख है। इन कीटों के आक्रमण से अनुमानतः किसान तथा चीनी
उद्योग को क्रमशः गन्ने (Ganne) की उपज तथा चीनी उत्पादन में प्रति वर्ष 20 प्रतिशत और 15 प्रतिशत की
हानि उठानी पड़ती है।
दीमक Sugarcane ki Kheti
क्षति:- दीमकी का प्रकोप गन्ने (Ganne) की बुआई के साथ-साथ शुरू हो जाता है। बाहरी पतियां पहले
सूख जाती है।
नियन्त्रण:- बुआई के समय नालियों के सेट पर गामा बी.एच.सी. का 1 कि.ग्रा. सक्रिय भाग प्रति
हैक्टर की दर से अथवा बुआई के बाद गामा बी.एच.सी. या इंडोसल्फाइन 1 कि.ग्रा. सक्रिय अवयव
प्रति हैक्टर से सिंचाई जल में मिला देने से दीमक का प्रकोप रोकने में प्रभावी सफलता पाई गई है।
पाइरिया
क्षति:- पत्तियां पीली पड़ जाती हैं तथा उन पर कवक उग आते है।
नियन्त्रण:- फसल पर 20-25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से 10 प्रतिशत बी.एच.सी. का छिड़काव
करें।
अंकुर बेधक
क्षति:- उपोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में अंकुरण से 4 माह तक इसका प्रकोप रहता है। इसके लार्वा
पर्ण चक्रों में बेधन करते हुए वृद्धि बिंदु तक पहुंच कर इसे मृत केन्द्र बना देते है।
नियन्त्रण:- 1. ग्रसित गन्नों को निकाल देने, पताई बिछाकर हल्की मिट्टी चढ़ाने से प्रकोप कम
होता है।
2. बुआई के 31वें और 60वें दिन क्लोरोपाइरीफास 10जी या लिंडेन 6जी भूमि में डालने से इस कीट
का नियंत्रण किया जा सकता है।
जड़ बेधक
क्षति:- प्ररोह के आधारीय सिरे पर बेधक का छेद बन जाता है। ऐसे केन्द्र बन जाते है, जिसे आसानी
से नहीं देखा जा सकता है।
नियन्त्रण:- 1. क्लोरोपाइरीका 1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग।
2. जुलाई से सितम्बर के बीच 15 दिन के अंतर पर ट्राइकोग्रामा काईलोनिस के वयस्क परजीवी
वितरित करके प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है।
चोटी बेधक क्षति:- गन्ने (Ganne) के बीच की बढ़ोतरी वाली गोफ की एक-दो पत्तियां सूखकर डेड हर्ट बना लेती है।
विकसित गन्ने (Ganne) में ऊपर की अंतर्सधि से (बंचीटाप) इधर-उधर शाखाएं निकल आती है।
नियन्त्रण:- 1. अंड समूहों को इकट्ठा करके नष्ट करना।
2. जून के अंतिम सप्ताह में कार्बोफ्यूराॅन 3 जी. अथवा फोरेट 10 जी. दवा 1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व
प्रति हैक्टर की दर से डालने पर इसके प्रकोप को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है।
तना बेधक
क्षति:- इसका प्रकोप वर्षाकाल के बाद जल प्रराव की स्थिति में अधिक पाया जाता है। गन्ना गिरने
की स्थिति में इसका प्रकोप चरम सीमा पर पहुंच जाता है।
नियन्त्रण:- गन्ने (Ganne) की सूखी पत्तियों को सितम्बर और अक्टूबर में दो बार काट देना चाहिए। अगस्त
के बाद 1-1 महीने के अंतराल पर मोनोक्रोटोफास दवा 0.75 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की
दर से दो बार छिड़काव करना चाहिए।
पोरी बेधक
क्षति:- इसके लार्वा गन्ने (Ganne) के कोमल व मुलायम भाग को क्षतिग्रस्त करते है।
नियन्त्रण:- सितम्बर और अक्टूबर में 1 महिने के अंतराल पर मोनोक्रोटोफास दवा 0.75 कि.ग्रासक्रिय
तत्व प्रति है. की दर से छिड़काव करना चाहिए अथवा जुलाई से अक्टूबर तक 10 दिन के
अंतराल पर ट्राइकोग्रामा किलोनिस परजीवी के 50 हजार वयस्कों को प्रति हैक्टर की दर से खेत
में वितरित करना चाहिए।
गन्ने (Ganne) की बंधाई
वर्षाकाल में फसल जब बड़ी हो जाती है तो हवा चलने के साथ-साथ इसके गिरने का अंदेशा
बढ़ जाता है, जिससे इसकी उपज और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः गन्ने (Ganne) को गिरने
से बचाने के लिए पंक्तियों की मदद से आपस में बांधना ठीक रहता है। उपरोक्त उन्नत तकनीकों
को अपनाकर बंसतकालीन गन्ने (Ganne) की उपज में आशातीत बढ़ोत्तरी की जा सकती है और प्रति हैक्टर
प्राप्त होने वाली आमदनी भी बढ़ाई जा सकती है। गन्ना बोने की मशीन से बुआई खर्च आधा पड़ता
है तथा एक हैक्टर क्षेत्रफल की बुआई 4-6 व्यक्तियों द्वारा लगभग 4-5 घंटे में पूरी कर ली जाती
है। इसके द्वारा नाली खोदना, बीज डालना, खाद और कीटनाशक दवा डालना और बीज के ऊपर
मिट्टी डालकर दबाना आदि क्रियाएं एक साथ संपन्न हो जाती है। इन सभी कार्यों को करने में काफी
समय लगता है जिससे मृदा और बीज गन्ने (Ganne) से नमी का हृास हो जाने से अंकुरण में कमी आती है।
इन सभी कार्यों को कम समय और कम व्यक्तियों द्वारा शीघ्र संपन्न करने हेतु इसमें गन्ने (Ganne) के जमाव
में 3-5 प्रतिशत की वृद्धि आंकी गई है। इस यंत्र की उपयोगिता देर से बुआई की स्थितियों में और
भी बढ़ जाती है। बंसतकालीन गन्ने (Ganne) की बुआई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75-80 सें.मी. व अत्यंत
देरी से बुआई की दशा 60 सें.मी. रखना चाहिए।
यदि गन्ने (Ganne) के पूरे भाग को बिना टुकड़े किये बोने के काम लिया जाता है तो उसका ऊपरी भाग
ही अंकुरित हो पायेगा तथा नीचे जड़ की ओर का भाग अंकुरित नहीं हो पायेगा। गन्ने (Ganne) के कुछ
हार्मोन्स ऊपर से नीचे की ओर चलते है जिनके प्रतिकूल प्रभाव से नीचे की अँाखें वृद्धि करने के
लिए क्रियाशील नहीं रहती है। गन्ने (Ganne) को टुकड़ों में काटने का उद्देश्य यही है कि इन हार्माेन्स का एक
जगह से दूसरी जगह जाना रूक जाता है एवं प्रत्येक कली का अपना कार्य ठीक से कर सकती है। इसलिए गन्ने (Ganne) को हमेशा काट कर तीन से चार आँख वाले टुकड़ो को रोपाई के काम लिया जाता है।
अंकुरण को प्रभावित करने वाले कारक:-
गन्ने (Ganne) की फसल में टुकड़ों में अंकुरण को प्रभावित करने वाले कारक:-
(1) तने का भाग:- गन्ने (Ganne) के ऊपरी भाग के टुकड़े, निचले भाग के टुकड़ों से अच्छे रहते है।
(ं) ऊपरी भाग से प्राप्त कलियों की अंकुरण क्षमता अधिक होती है, क्यांेकि नीचे के भाग में कठोरता
आने से अकुरण क्षमता कम हो जाती है।
(इ) गन्ने (Ganne) के ऊपरी भाग में ग्लूकोज की मात्रा अधिक पाया जाती है जो अंकुरण क्षमता में सहायक
रहता है।
(ब) गन्ने (Ganne) के ऊपरी भाग में पर्व (प्दजमतदवकम) की लम्बाई कम होती है अतः प्रति इकाई लम्बाई में
कलियां अधिक से अधिक मिल जाती है।
(क) तने का ऊपरी हिस्सा कीटों से कम प्रभावित होता है क्योंकि यह भाग पत्तियों द्वारा ढका रहता
है।
2 . रोपाई के समय कलिकाओं की स्थिति:- रोपाई या बोआई के समय कालिका के टुकड़ांे के
दोनों ओर आँख होती हैं तो अंकुरण अच्छा होता है।
3. गन्ने (Ganne) के टुकड़ो पर पत्तियां होने पर अंकुरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए पत्तियों को
सावधानी से उतार दिया जाना चाहिए।
गन्ने (Ganne) की रोपाई को प्रभावित करने वाले कारक:
1 . गन्ने (Ganne) की किस्म:- अधिक उपज देने वाली या अधिक मोटे गन्ने (Ganne) वाली किस्मों की रोपाई नालियों
में करना लाभदायक रहता है।
2 . मृदा:- चिकनी अथवा भारी मृदाओं में बुआई या रोपाई समतल खेतों से करनी चाहिए।
3 . उर्वरक क्षमता:- अधिक उपजाऊ मृदाओं में नालियों मे बुआई करनी चाहिए तथा दोमट या कम
उपजाऊ मृदा में समतल भाग में रोपाई की जानी चाहिए।
4 . समय की उपलब्धता:- शरदकाल में भूमि की जुताई के लिए आवश्यक समय मिल जाता है अतः
शरद काल की बुआई नालियों में आसानी से कर सकते है। बसन्त कालीन बुआई के समय,
समयाभाव के कारण समतल में भी बुआई करनी पड़ सकती है।
गन्ने (Ganne) की फसल के रोग एवं उनकी रोकथाम
गन्ने (Ganne) की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग:-
(1) लाल सड़न गन्ने (Ganne) की फसल का मुख्य रेाग माना जाता है। इस रोग की मुख्य पहचान पत्तों का
सुखना, गन्ने (Ganne) के पौधों में दुर्गन्घ आना एवं तने को बीच से चीरने पर लम्बी लाल धारियां दिखाई देना
है। इस रोग से फसल के बचाव के लिए गन्ने (Ganne) के बीज का चयन सावधानीपूर्वक करना तथा रोपाई
के समय टुकड़ों को एग्रोसान जी.एन. या थाइरम या कैप्टान या बाविस्टिन नामक दवा से (कोई भी
एक) 0.2 प्रतिशत घोल बना कर, उसमें 5 मिनट तक उपचारित करके बोआई करें। रोग प्रतिरोधी
किस्म के बीज का उपयोग भी काम लिया जाना उचित रहता है। उक्ट्ठा ( ॅपसज):- यह रोग गन्ने (Ganne) की फसल में कवक द्वारा फैलने वाला रोग है। इस रोग के प्रभाव
से पौधे मुरझाकर सुखने लगते है। तना हल्का एवं अन्दर से खोखला हो जाता है। रोगी पौधों को
ध्यान से उखाड़ कर देखने पर, जड़ों में काले धब्बे, जिनके कारण जड़ें उखाड़ने पर ऊपरी भूरी परत
मृदा में ही रह जाती है तथा सफेद भाग तने के साथ आ जाता है। इसकी रोकथाम के लिए लाल
सड़न रोग की तरह रोपाइ से पूर्व टुकड़ो को उपचारिता करना उचित रहता है। यदि खडी फसल
में उकटा रोग का प्रभाव दिखाई देता है तो बाविस्टिन या डाइथेन जेड-78 या डाइथेन एम-45 के
0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव 15 दिवस के अन्तराल में कम से कम तीन छिड़काव किया जाना
उचित माना गया है।
कंड रोग ( Kand Rog):- कंड रोग भी गन्ने (Ganne) की फसल का प्रमुख रोग माना गया है यह
रोग बीजों द्वारा फैलता है। इसमें तने से सूटी, पतली लम्बी, काली भूरी संरचना की डन्ठल निकलती
है, इस डन्ठल की झिल्ली टूटने पर काला चारकोल के समान पाउडर निकलता है जो बिखर जाता
है। इस रोग से फसल का बचाव करने के लिए फसल की रोपाई से पूर्व बीजोपचार करना तथा रोग
प्रतिरोधी किस्में का प्रयोग करना ही उचित उपचार माना गया है।
फसल की कटाई:-
गन्ने (Ganne) की फसल की उपज, उसमें पाये जाने वाले रस पर निर्भर करती है। गन्ने (Ganne) के रस में दो
अवयव (अ) सुक्रोज तथा (ब) ग्लूकोज के रूप में पाये जाते है। गन्ने (Ganne) की कटाई अधिकतम सुक्रोज
की मात्रा के समय करनी चाहिए। यह मात्रा ताप बढ़ने के साथ-साथ सुक्रोज से टूटकर ग्लूकोज
में बदलने से कम हो जाती है। इसलिये फसल कटाई, फसल पकने पर की जानी चाहिए। फसल
पकने की जाँच के मुख्य बिन्दु:
1. गन्ने (Ganne) की पक्की हुई फसल हल्का पीलापन लिए हुए होती है।
2. पौधों की बढ़वार रूक जाती है एवं फूल निकल आते है।
3. गन्ने (Ganne) की गांठों पर उपस्थित कलियाँ फूल जाती है।
4. गन्ने (Ganne) के तने से धातु के समान बजाने पर आवाज किनलना।
5. गांठों से तोड़ने पर आसानी से गन्ना टूट जाता है।
6. फसल पकने की जाँच हैन्ड रेफ्रेक्टोमीटर द्वारा की जा सकती है।
7. ब्रिक्स 17 प्रतिशत से ऊपर रहना चाहिए।

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