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सही नहीं है अति

एक दाशर्निक के पास रोज बहुत लोग परामशर् लेने आते थे। लोग अपनी पारिवारिक उलझनें बताते और उनका समाधान पूछते। एक दिन एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ आया और पत्नी के आलस्य और कम्जूसी की निंदा करने लगा। दाशर्निक ने उस महिला को स्नेहपूवर्क अपने पास बुलाया।

फिर उन्होंने अपने एक हाथ की मुठठी बांधैकर उसके सामने की और पूछा, अगर यह हमेशा ऐसी ही रहे तो क्या होगा? महिला बोली कि अगर यह हाथ हमेशा ऐसा ही रहेगा तो वह अकड़कर निकम्मा हो जाएगा।

उस महिला का जवाब सुन दाशर्निक ने हाथ खोलकर उसके आगे किया और पूछा, अगर यह हमेशा ऐसा रहे तो क्या होगा? वह औरत बोली, तब भी यह अकड़कर बेकार हो जाएगा। दाशर्निक ने लोगों से कहा कि यह महिला बुद्धिमान भी है और दूरदशीर् भी। यह अच्छी तरह जानती है कि मुठठी बंद रखने और हाथ खुला रखने में क्या हानि है? फिर वे उस महिला से बोले, तुम तो खुद सब कुछ समझती हो।

इस समझ का प्रयोग दैनिक जीवन में भी करो। किसी भी चीज की अति अच्छी नहीं। न हाथ खुला अच्छा है और न ही बंद। इन दोनों में संतुलन रखकर चलो। न तो लापरवाही से धैन खर्च करो न ही कम्जूसी से। तब तुम सरलता से जीवनयापन कर सकोगी। दाशर्निक की बातों में छिपा हुआ संदेश उस महिला को पूरी तरह समझ में आ गया था।

Friends हमें इस हिंदी कहानी से सिख मिलती है कि  अपने व्यवहार को संतुलित रखें।

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