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भारतीय कृषि और आधुनिक युग

भारतीय सभ्यता और उसके विकास का लम्बा इतिहास रहा है। सभ्यता और भारतीय कृषि में
उसकी भूमिका का विवरण डॉ.एम.एस. रंधावा की पुस्तक ‘भारत
में कृषि का इतिहास’ में बहुत ही प्रभावशाली ढंग
से दिया गया है। ईसा से पूर्व कृषि का इतिहास पढ़े, तो पता चलता है कि, सर्वप्रथम विकास में कृषि
यंत्रों के विकास के साथ-साथ पालतू और दुधारू पशुओं की गिनती भी सम्मिलित है। इनी-गिनी
फसलों के पौधों के बीजों का चयन प्राथमिक कृषि यंत्रों और पालतू व दुधारू पशुओं के
चयन के साथ का माना जाता है। कृषि यंत्रों में देशी हल का आविष्कार ईसा से 2,900 वर्ष पूर्व हुआ था। ईसा से लगभग 2,300 वर्ष पूर्व खेती करने वाली मुख्य फसलें जैसे चावल, गेहूँ, जौ, सरसों, उड़द,
मूग, मसूर,
कपास, रागी आदि का चयन और उनकी खेती का पता चलता है। लोहे का
आविष्कार ईसा से 1400 वर्ष का माना जाता है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता का प्रभाव
पूरे उत्तरी भारत की सभ्यता के विकास पर पड़ा है जिसमें ईंटों के घर, कृषि यंत्र, रसोईघर के बर्तन आदि सम्मिलित है। सभ्यता के साथ अगर इन उपरोक्त मोटे अनाजों के
विकास को जोड़ें तो यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि, इन घास-परिवार वाली सभी फसलों की खेती उनकी गुणवत्ता
और प्रतिकूल/अनुकूल जलवायु में खेती करने की सफलता पर निर्भर रही है। वैज्ञानिक कृषि
का विकास 16वीं शताब्दी में यूरोप में जनसंख्या बढ़ने के कारण कृषि उत्पादन बढ़ाने
की आवश्यकता पड़ी। नई आर्थिक नीतियों का जन्म हुआ, जिसका सीधा प्रभाव कृषि पर पड़ा। उपनिवेशीय खेती मात्र वहां जनता की खाद्यपूर्ति
के लिए की जाने लगी। अतः उपनिवेश देशों में गन्ना, कपास, तम्बाकू, चाय और पशु उत्पादन-ऊन और खाल पैदा करने पर ध्यान दिया
गया। 15वीं से 19वीं शताब्दी तक दास प्रथा द्वारा श्रमिकों की पूर्ति की जाने लगी, परन्तु 19वीं शताब्दी तक दास प्रथा का दमन हो चुका था।
नये युग में वैज्ञानिक क्रांति के बाद यूरोप के देशों में कृषि में अनुसंधान किए जाने
लगे, जिसके परिणामस्वरूप फसलों की उन्नत
किस्मों और गाय तथा भेडो की उन्नत नस्लों का विकास हुआ। गाय की ग्वैरंसी नस्ल आज भी
अधिक दूध देने वाली मानी जाती है। विक्टोरिया के शासनकाल तक भूमि मालिक के साथ किसान, फसल उत्पादक और भूमि रहित श्रमिकों पर आधारित थी और अमेरिका
में इस प्रकार की खेती आम थी। जल निकास की व्यवस्था के परिणामस्वरूप अधिक भूमि खेती
के अन्तर्गत आई और औद्योगिक क्रान्ति से खेती में मशीनों का प्रचलन बढ़ा। प्रौद्योगिकी
द्वारा कृषि में आई क्रांति से जो उन्नति हुई उनमें पशु प्रजनन तथा 18वीं शताब्दी के
प्रारम्भ में और 18वीं शताब्दी के अंत में खेतों में चूना फैलाना मुख्य है। वर्ष
1797 में लोहे का मिट्टी पलटने वाले हल का विकास हुआ। 18वीं सदी के शुरू में बुआई मशीन
का विकास एक अंगे्रज कृषक ने किया। सन् 1831 में सायप्रस में कटाई मशीन तैयार की गई।
19वीं शताब्दी के अंत तक हल खींचने का काम पशु शक्ति से निकलकर भाप के इंजन द्वारा
किया जाने लगा था। खाद्यानों की बढ़ती मांग और उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति
हेतु विश्व व्यापार की मांग बढी और विज्ञान-प्रौद्योगिकी का प्रयोग कृषि उत्पादन बढ़ाने
के लिए होने लगा जिसके परिणामस्वरूप 20वीं सदी के मध्य में कृषि-व्यवसाय की धारणा पनपी।
19वीं सदी में कीट-रोगों की रोकथाम हेतु विभिन्न प्रकार के जहरीले पदार्थों का फसलों
पर छिड़काच किया गया और जैविक नियंत्रण के ध्येय से कीटों का प्रयोग किया गया। फसलों
की विशेषकर अंगूर की कीट-रोग रोधी किस्में विकसित की गई। यातायात के साधनों से कृषि
के विकास को बल मिला। पिछली दो सदियों में हुए विकास के फलस्वरूप कृषि उत्पाद के विशिष्ट
उत्पादन को बढ़ावा मिला। जब यूरोप के किसान को अन्न उत्पादन लाभप्रद नहीं लगा या शहरीकरण
बढ़ा तो डेयरी उद्योग की ओर ध्यान बढ़ा। दूसरे महायुद्ध के बाद जनसंख्या वृद्धि के
कारण खाद्यान्न उत्पादन की ओर रूझान हुआ, जिसके फलस्वरूप उन्नत और संकर किस्मों के साथ खेती की प्रौद्योगिकी और हरित क्रांति
का जन्म हुआ। इस विकास के परिणामस्वरूप आज भारत जैसे विकासशील देश भी खाद्यान्न में
आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि अनेक कृषि उत्पादों का निर्यात भी कर रहे हैं। इस प्रकार
पाषाण युग का मानव खाद्य पदार्थ बटोरने, शिकार करने और आवश्यकता के कुछ पौध् ो और पशु पालने की प्रक्रिया से आगे बढ़ा।
विभिन्न युगों और सभ्यताओं के दौर से गुजरकर आज यही मानव सभ्य मानव के रूप में प्रस्तुत
है। खाद्य पदार्थों में विभिन्न व्यंजनों का सेवन करता है। आने वाले समय में यही मानव
जैव प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटर के आधुनिक युग के साथ क्या करेगा समय ही बतायेगा। सन्
1899-1900 का भीषण अकाल हमें एक भयंकर त्रासदी की स्मृति दिलाता है जिससे कृषि, पशुधन तथा ग्रामवासियांे की अभूतपूर्व क्षति हुई। इस
घटना में तत्कालीन ब्रिटिश राज प्रतिनिधि वाइसराॅय लाॅर्ड कर्जन को विवश किया कि इस
समस्या के स्थाई समाधान और कृषि के चहुँमुखी विकास के लिए रचनात्मक कार्यक्रम की रूपरेखा
के उद्देश्य से वर्ष 1904 में भारतीय कृषि बोर्ड का गठन हुआ। श्री फ्रेंक सिली की अध्यक्षता
में प्रशासनिक निर्णय लिया गया। बिहार के दरभंगा जिले में बंगाल सरकार की कृषि फार्म
के लिए उपलब्ध भूमि क्षेत्र का वातावरण तथा जलवायु भी कृषि-शोध के लिए अनुकूल हैं, इसलिए अनुसंधान संस्थान की स्थापना अप्रैल 1905 में दरभंगा
जिले में क्षेत्र में गंडक नदी के तट पर इस संस्थान के भव्य भवन की आधारशिला रखी गई।
वास्तुकला की दृष्टि से यह अति सुन्दर भवन था। फिप्स के अनुदान से संस्थान के भवन का
निर्माण होने के कारण इस भवन का नाम दानदाता को सर्वदा याद रखने के उद्देश्य से ‘फिप्स प्रयोगशाला’ रखा गया तथा यह क्षेत्र फिप्स आफ यूएसए के लघु नाम पूसा से प्रसिद्ध हो गया। पूसा
स्थित कृषि संस्थान का 1911 में इम्पीरियल इंस्टीट्यूट आॅफ एग्रीकल्चरल रिसर्च नामकरण
किया गया। इसके बाद 1919 में यह इम्पीरियल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के नाम से
प्रचलित हुआ। संस्थान की स्थापना के साथ ही फसलों और पशुओं के प्रजनन, मृदा रसायन विज्ञान, कीट तथा कवक विज्ञान और आर्थिक वनस्पति विज्ञान विषयों में अनुसंधान की रूपरेखा
तैयार की गई और लक्ष्य प्राप्ति हेतु संस्थान में पांच विभाग स्थापित किए गए। संस्थान
के निदेशक बर्नाड कोवेन्टी ने सन् 1904 से सन् 1916 और उनके पदमुक्त होने पर जेमस मैकेना
ने सन् 1916-20 तक कृषि अनुसंधान का मार्गदर्शन किया। कृषि अनुसंधान में जिन लोगों
ने अग्रणीय योगदान दिया, उनमें अलबर्ट हाॅबर्ड, एडविन जे. बटलर, एच. मैक्सवेल लैफराॅय, जे. डब्ल्यू लेदर तथा एफ.जे.
रैथ उल्लेखनीय है। इन वैज्ञानिकों ने अपने विशिष्ट क्षेत्र में शोध की आधारशिला रखी, जिसके परिणामस्वरूप हमारे देश में कृषि का विकास सम्भव
हुआ। अन्य ब्रिटिश मूल के वैज्ञानिक जिन्होंने नीतिपरक कृषि का पथ प्रशस्त किया उनमें
बेनब्रिज लेचर, एफ.एम. हाॅबलेट विलियम मैकरे, एफजे.ए फ. शाॅ, ग्रेबिली अलबर्ट, सी.एम. हचिन्सन, जे.एच. बाल्टन, एस. मिलीगन, एल.डी. गैलोवे, जी. डब्ल्यू पादविक, डेविड क्लाउसटन, डब्ल्यू एच. हेरीसन, बर्नाड केनआदि की भूमिका सराहनीय है। ब्रिटिश काल में
कृषि के विकास में जिन लोगों ने अपने अथक प्रयास से कृषि-विज्ञान को सुसज्जित किया, उनमें सर्वश्री बी.पी.पाल, बी. विश्वनाथ, जे.एन. मुखर्जी, एम.अफजल हुसैन, हेमासिंह पुरथी, जी.आर. दत्त, सी.सी. घोष, ए.एन.पुरी, ए.एम. मुस्तफा, रायसाहब काशीराम, खानबहादुर, अब्दुर रहमान खान, रखलदास बोस, कासनजी नायक, एन. पार्थसारथी, एस.बी. देसाई, आर.बी. देशपाण्डे, अजमतुल्लाह खान, रोहिणी रंजन सेन, अब्दुल हफीजखान, एल.एस. सुब्रामनियम, जे.एफ. दस्तूर, मनोरंजन मित्रा और अनेक भारतीय वैज्ञानिकों के बहुमूल्य
योगदानों के इतिहास में सदैव सम्मान के साथ याद की जाएगी। इन भारतीय कृषि वैज्ञानिकों
का योगदान किसी भी दृष्टि से ब्रिटिश मूल के वैज्ञानिकों से कम नहीं रहा। सच्चे अर्थों
में इन्हीं वैज्ञानिकों के परिश्रम का ही परिणाम है कि देश में कृषि की आशानुकूल प्रगति
हुई है। खाद्यान्नों की उपलब्धता सुनिश्चित करना स्वाधीन भारत सरकार के लिए एक चुनौती
थी। अन्न उपलब्ध कराने के लिए, इसका आयात करना पड़ता था।
देश में संसाधनों की कमी नहीं थी,
यदि कमी थी
तो योजनाबद्ध तरीके से कृषि के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों के उपयोग की। ऐसे समय में तत्कालीन
खाद्य और कृषि मन्त्री भारत रत्न स्वर्गीय सी. सुब्रामणियम ने देश में खाद्यान्न अभाव
की समस्या को समूल नष्ट करने की चुनौती स्वीकार की। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् में
तत्कालीन महानिदेशक स्वर्गीय डॉ. बीपी. पाल ने देश में कृषि-समृद्धि के महत्व पर गहन
चिंतन किया और पूसा संस्थान के तत्कालीन निदेशक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन को योजनाबद्ध
तरीके से कृषि विकास की रूपरेखा तैयार करने का निर्देश दिया गया। योजना को कार्यान्वित
करने में डा. स्वामीनाथन का विशेष योगदान था, उन्होंने देश में गेहूँ की उत्पादकता बढ़ाने में लिए बौने गेहूँ की उपयोगिता को
समझा। उनकी दूरदृष्टि के फलस्वरूप गेहूँ और मक्का विकास केन्द्र, मेक्सिको के प्रमुख और बौने-गेहूँ के जनक नार्मन ई. बोरलोग
ने सन् 1963 में देश का भ्रमण किया और विपुल उपजशील किस्मों ने एक क्रांति को जन्म
दिया, दिनदूनी और रात चैगुनी प्रगति से
किसान खिलखिला उठा। गेहूँ क्रांति को हरित क्रांति की संज्ञा दी गई। भारत की प्रधानमंत्री
स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सन् 1968 में गेहूँ क्रांति में संस्थान के योगदानों
के उपलक्ष में एक डाक टिकट जारी किया। कृषि उत्पादकता को बढ़ाकर ही गरीबी हटाने, भूख मिटाने, रोजगार और आय बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा प्रदान करने, पर्यावरण को बचाने तथा ग्रामीण भारत का आर्थिक बदलाव
करने में सफल हो सकते हैं। इस परिदृश्यपूर्ण संकल्पना को साकार करने के उद्देश्य से
विगत वर्षों योजनाओं तथ कार्यक्रमों में आवश्यकतानुसार वांछित परिवर्तन किए गए हैं।
सन् 1934 का वर्ष भारतीय कृषि इतिहास में एक त्रासदी का वर्ष रहा, इसमें भीषण भूकम्प के कारण इम्पीरियल कृषि अनुसंधान को
अपार क्षति हुई। भवन के क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण इसको दरभंगा जिले से नई दिल्ली
लाया गया। जो वर्तमान में पूसा इन्स्टीट्यूट के नाम से जाना जाता है। इस संस्थान का
निर्माण दो वर्ष तक चला। 7 नवम्बर 1936 को विधिवत् उद्घाटन किया गया। भारतीय मूल के
प्रथम व्यक्ति को निदेशक का कार्यभार दिया गया। विख्यात मृदा वैज्ञानिक राय बहादुर, वी. विश्वनाथ को प्रथम निदेशक बनाया गया। देश खाद्यान्न
के मामले में निरन्तर आत्मनिर्भर की ओर बढ़ता रहा है। गेहूँ की विश्वविख्यात किस्म
पूसा-4 (एन.पी.-4) को पूसा में विकसित किया गया और उसके बाद एन.पी. 52, एन.पी. 80-5, एन.पी.165 जैसी गेहूँ की उन्नत व अधिक उपजशील किस्में खेती के लिए विकसित की गई।
इनमें से कुछ किस्मों को उनकी गुणवत्ता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य प्रदर्शनी में
पुरस्कृत भी किया गया। गेहूँ के अतिरिक्त कोयम्बटूर गन्ने की किस्मों में आनुवंशिक
क्षमता बढ़ाकर इस फसल की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार का कार्य पूसा संस्थान के
आरम्भिक काल में हुआ। इस रचनात्मक कार्य से देश में चीनी उद्योग को स्थापित करने में
विशेष सहायता मिली। जौ के सुधार कार्यक्रम को सशक्त करने के उद्देश्य से इस संस्थान
ने देश के सभी भौगोलिक क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया और जौ की कुछ ऐसी बोनी प्रजातियों
का संग्रह किया, जिनकी इस फसल के विकास में
उपयोगिता थी। आलू के महत्व को ध्यान में रखते हुए, इस फसल का भी देशव्यापी सर्वेक्षण हुआ और आलू की वन्य प्रजातियांे के जननद्रव्य
का उन्नत किस्मों के विकास के लिए संग्रहण किया गया। आलू के इस जननद्रव्य का उपयोग
न केवल हमारे देश में, बल्कि विश्व के अनेक देशों
में किया जाता है।
      बैलजीनियम तम्बाकू का सिगरेट उद्योग
के लिए विशेष महत्व है। हमारे देश में इस किस्म की उत्तम तम्बाकू का आयात किया जाता
था। पूसा स्थित वनस्पति विज्ञान केन्द्र ने वर्ष 1964 में सिगरेट व्यवसाय के अनुकूल
तम्बाकू की उन्नत किस्मों का विकास किया और तम्बाकू की शुद्धि के लिए जरूरी धूमनाल
(फ्लू करिंग) तकनीक विकसित की। इन आरंभिक अनुसंधानों के नतीजो ने तम्बाकू का विकास-मार्ग
प्रशस्त किया और इसके परिणामस्वरूप तम्बाकू का आयात न केवल रूका बल्कि अब हमारे देश
को तम्बाकू निर्यातक देशों की विशेष श्रेणी में सम्मिलित किया गया। इस तरह पूसा संस्थान
के शुरूआती दौर के शोध-कार्य से देश का सिगरेट उद्योग लाभान्वित हुआ है। नील की खेती
में ब्रिटिश प्रशासन की विशेष रूचि थी किन्तु इस फसल को ग्लानि रोग से काफी हानि होती
थी। इसलिए पूसा वनस्पति विज्ञान केन्द्र की देखरेख में 10, 15 और 20 नम्बर से प्रचलित किस्मों को उत्पन्न किया गया।
इन किस्मों से नील की उपज बढ़ी और ग्लानि रोग से होने वाली अपार क्षति को रोका जा सका।
पूसा संस्थान ने 1932-33 में विश्व विख्यात दुधारू गाय की साहीवाल नस्ल का विकास किया।
इस नस्ल की गाय में दूध की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए आनुवांशिक गुणों का समावेश
किया गया था जिससे दूध की उत्पादकता बढ़ी, जो अपने पैतृकों की तुलना में कई गुना अधिक थी। साहीवाल नस्ल का विकास इस संस्थान
की एक विशिष्ट उपलब्धि मानी जाती है। इम्पीरियल कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा ने मानव संसाधन विकास में उत्कृष्ट कार्य किया।
इस संस्थान ने वर्ष 1923 में एसोशिएटशिप डिप्लोमा (आई.ए.आर.आई.एसोशिएट) के रूप में
दो वर्षीय स्नातकोत्तर प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू करने का औपचारिक निर्णय लिया। इस पाठ्यक्रम
में जिन छात्रों ने शिक्षा ग्रहण की वे देश की राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं कृषि शिक्षा
के आधार स्तम्भ सिद्ध हुए। जमीनी जल के समुचित उपयोग के लिए जल प्रबंधन केन्द्र की
नींव डाली गई। फसल सुधार के क्षेत्र में आनुवांशिक मानचित्रण, माॅलीक्यूलरी मार्कर, जीनोम सिक्वेसिंग तथा पराजीन से संबंधित अनुसंधानों के लिए संस्थान ने स्थापित
लाल बहादुर शास्त्री जैव प्रौद्योगिकी केन्द्र अग्रणी भूमिका निभा रहा है। पादप विषाणुओं
पर अनुसंधान की शुरूआत भा.कृ.अ.सं. में हुई थी और विषाणुओं पर अनेक मौलिक कार्य किए
गए जिसका नेतृत्व डॉ. श्यामा प्रसाद राय चैधरी ने किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्
ने देश में पादप-विषाणुओं पर व्यावहारिक तथा अग्रणी अनुसंधान की दिशा निर्देशिका करने
के अभिप्राय से इन संस्थान में पादप-विषाणुओं के उत्कृष्टता केन्द्र की स्थापना की
है। संस्थान की राष्ट्रीय फाइटोट्राॅन सुविधा दक्षिण एशिया में नियंत्रित पर्यावरण
में अनुसंधान की सुविधाएं उपलब्ध कराने का एकमात्र केन्द्र है। नई संकल्पनाओं और नवीनतम
दृष्टिकोणों के माध्यम से कृषि-प्रसार, प्रौद्योगिकी मूल्यांकन और इनके हस्तांतरण के लिए कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केन्द्र
स्थापित किये गये। हमारे देश में विगत दस दशकों के दौरान हुई कृषि प्रगति में संस्थान
का बहुत बड़ा योगदान है। संस्थान के तत्कालीन निदेशक डा.बी.पी. पाल के मार्गदर्शन और
उनके अथक प्रयासांे से गेहूँ की अनेक किस्मों में एन.पी. 700 और एन.पी. 800 श्रृंखला
का विकास हुआ। इन किस्मों में गेहूं के रतुआ रोग के लिए उच्च प्रतिरोध क्षमता थी तथा
इनके दानों की गुणवत्ता भी बहुत अच्छी थी। पादप रोग विशेषज्ञ डॉ. कर्मचन्द मेहता की
रोग प्रतिरोधी किस्मों के विकास में अहम् भूमिका रही। उन्होंने डॉ. पाल के साथ मिलकर
सराहनीय कार्य किया। इन्ही शोधों के नतीजों से उच्च उपजशील, बौनी,
दानांे की अच्छी
गुणवत्ता युक्त और उर्वरकों तथा सिंचाई के अनुकूल परिणाम देने वाली गेहूं की किस्मों
का विकास हुआ। गेहूं की विशिष्ट किस्मों जैसे ‘कल्याणसोना’ और ‘सोनालिका’ को देश के बहुत बड़े भू-भाग में उगाया गया। भा.कृ.अ.
संस्थान द्वारा विकसित गेहूँ की किस्म एच.डी.2329 की प्रतिवर्ष 4 मिलियन हैक्टर क्षेत्र
में खेती होती रही है। इस सफलता का श्रेय मुख्यतः गेहूं प्रजनक स्व. श्री वी.एस. माथुर
को जाता है। गेहूं क्रांति के फलस्वरूप वर्ष 1967-2004 के दौरान 1000 मिलियन टन से
भी अधिक अतिरिक्त गेहूं की उपज प्राप्त हुई, जिसका मूल्य खरबों रूपये आंका गया। गेहूं के रतुआ रोग के ‘पक्सीनिया-पथ’ की खोज और इस पथ में जीन- डिप्लायमेंट के माध्यम से इस रोग के नियंत्रण में डॉ.
एल.एम.जोशी और उनके सहयोगियों की विशिष्ट भूमिका रही है। अधिक पैदावार वाली चावल की
बौनी सुगंधित किस्म पूसा बासमती-1 इस संस्थान में विकसित हुई और इसे 1989 में बुआई
के लिए जारी किया गया। चावल की इस किस्म का देश के कुल बासमती निर्यात में लगभग 50
प्रतिशत का योगदान है। इसके निर्यात से देश को प्रतिवर्ष 1000 करोड़ रूपये की विदेशी
मुद्रा प्राप्त होती है। वर्ष 2001 में जारी की गई सुगंधित धान की पहली संकर किस्म
पूसा आर.एच. 10 के विकास से अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में सुगंधित चावल के निर्यात की
सम्भावना बढ़ी है। मक्का के उत्पादन में वृद्धि और इस फसल के सुधार कार्य में गति लाने
के उद्देश्य से संस्थान ने विदेशों से संकर किस्मों का प्रवर्तन किया और पिछले कुछ
दशकों में गंगा श्रृंखला के संकर तथा किसान, जवाहर, अम्बर पूसा-कम्पोजिट नाम
से चर्चित कम्पोजिटों को विकसित करके उत्पादन बढ़ाया है। अभी हाल में पी.ई.एच.एम.
-3 नामक संकर किस्म मक्का उत्पादक क्षेत्रों में सफल हुई है। संस्थान द्वारा विकसित
तिलहनों और दलहनों की उच्च उपजशील किस्मों की बडे़ स्तर पर खेती की जा रही है। सरसों
की पूसा बोल्ड और जय किसान तथा चने की पूसा 256 किस्में बहुत लोकप्रिय हुई हंै। इस
तरह संस्थान द्वारा पोषाहार सुरक्षा में योगदान दिया जा रहा है। खाद्यान्नों की भांति
ही संस्थान ने विभिन्न तरह की सब्जियाँ, फूलों और फलो की किस्मों का विकास किया है। सब्जियांे की श्रेष्ठ किस्मों का विकास
किया है। सब्जियों की श्रेष्ठ किस्मों जैसे गाजर की पूसा केसर, भिंडी की पूसा सावनी, टमाटर की पूसा रूबी, बैगन की पूसा पर्पल लांग
तथा गोभी की पूसा स्नोबाल आदि किसानांे की लोकप्रिय किस्में है। सब्जियों की इन किस्मों
से देश में बीज उद्योग को बढ़ावा मिला है। उच्च सघनता आरोपण के लिए आम की संकर किस्म
आम्रपाली, गैर परम्परागत क्षेत्रों
के लिए अंगूर की पूसा उर्वशी किस्म और पपीते की किस्म पूसा नन्हा इस संस्थान की कुछ
उत्तम व लोकप्रिय किस्मंे हैं। साथ ही कटफ्लावर के रूप में इस्तेमाल व सुगंध के लिए
गुलाब, ग्लेडियोलस, गेंदे और गुलदाउदी की भी अनेक किस्में जारी हुई हैं।
रासायनिक उर्वरकों का दीर्घकालीन अनुप्रयोग; फसल प्रणाली अनुसंधान; जल संसाधनों और मृदा की प्रकृति
तथा उसकी उर्वरता का मानचित्रण;
नाशीजीवों का
जैविक नियंत्रण; नाशक जीवनाशी अपशिष्टों का
विश्लेषण और विश्वव्यापी जलवायु परिवर्तनांे के अनुप्रयोग आदि क्षेत्रों में संस्थान
ने पूरे राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान किया है। समेकित कीट प्रबंधन की अवधारणा का मूलमंत्र
संस्थान के विख्यात कीट विज्ञानी डॉ. एसप्रध् ाान ने दिया था, जिसे बाद में राष्ट्रीय नीति के रूप में अपनाया गया।
संस्थान द्वारा वानस्पतिक नाशकजीवनाशी के रूप में नीम आधारित यौगिक रसायनों का कीटों
और नाशीजीवांे के विरूद्ध प्रयोग किया, जो समेकित कीट प्रबंधन के महत्वपूर्ण घटक के रूप मे ंसफल रहे है। पौधों द्वारा
उर्वरक नाइट्रोजन उपयोगिता के नियंत्रक के रूप में भी नीम-यौगिकों का उपयोग हुआ है।
ग्रामवासियों के लिए उपयोगी पूसा चैम्बर, पूसा बिन, बीज ड्रिल, आलू-भिंडी बुआई यंत्र, फीड ब्लाक मशीन आदि का डिजाइन और उनका विकास पूसा संस्थान ने किया है। वर्ष
1939 में गोबर गैस की खोज का श्रेय एस.वी.देसाई और डॉ. टी.डी. विस्वास को है। इस गैस
की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए संस्थान ने बायोगैस संयत्र का भी विकास किया।

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