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उस्ताद अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की जीवनी

गजल गायन में अपना खास मुकाम रखने वाले याद कर रहे है अपने
बचपन को।
      हम दोनों भाइयों का बचपन जयपुर
में ही गुजरा। मेरे वालिद साब उस्ताद अफजल हुसेन जयपुर वाले हमारे गुरु भी थे।
ठुमरी गायन में उनका अच्छा नाम था। हालांकि उनकी पकड़ क्लासिकल, सेमी क्लासिकल, गजल
और दादरा पर भी थी। हम दोनों भाइयों ने संगीत की शिक्षा उन्ही से हासिल की। वे
हमें सुबह चार बजे उठा देते और फिर रियाज कराते। अनुशासन के मामले में वे कठोर थे।
वे कहते थे – ‘भारतीय संगीत तो खजाना है, आप इस
को खोजते रहिये, आप को कुछ न कुछ तो मिलता रहेगा।’ उनका मानना था की आर्ट का शॉर्टकट नहीं होता।
बचपन में सायरी का शॉक
हम दोनों भाइयो को बचपन से ही शायरी का शॉक था। शेरो-शायरी करना , गजल सुनना
और गुनगुनाना अच्छा लगता था। हमारे पिता जी का सपना था की हम संगीत में नाम कमाये।
वे गजल में हम दोनों भाइयो की जोड़ी बनाना चाहते थे। दरअसल गजल गायन में मेल-फीमेल
की जोड़ी थी, लेकिन वे हम दोनों भाइयो की मेल जोड़ी बनाकर अनूठा और नया प्रयोग करना
चाहते थे और उनका यह प्रयोग कामयाब रहा।
पहला गीत
हमने पहली बार बाल कलाकार के रूप में आकाशवाणी जयपुर से गीत गाया। उस वक्त मैं
पांच साल का और मोहम्मद भाई सात साल के थे। गायन के क्षेत्र में वो हमारा पहला कदम
था। उस गाने के बोल हमें आज भी याद है। आखिर कैसे भुला सकते है करियर के उस पायदान
को।
हम साथ-साथ है
हम दोनों का स्कूल में एडमिसन एक साथ करवाया गया। साथ-साथ पढ़े। दसवी में दोनों
फेल हो गए और फिर दोनों ने एक साथ पढाई छोड़ दि। हमारी पढाई का जीवन साथ शुरू हुआ
और साथ ही खत्म हुआ।
बनना चाहते थे चित्रकार और व्यवसायी
दरअसल मैं (मोहम्मद) शुरू-शुरू में चित्रकारी भी करता था। मैंने अपने वालिद का
एक पोट्रेट भी बनाया था। मेरी ख्वाइश थी चित्रकार बनने की , लेकिन बन गया गजल
गायक। अहमद भाई भी शुरू में नगीनों का व्यवसाय कारण चाहते थे। उनकी इच्छा इस
व्यवसाय में नाम कमाने की थी। उन्होंने इस व्यवसाय से जुडी जानकारी भी जुटाई और
कुछ प्रयास भी किये।लेकिन तकदीर तो हमे गजल गायक बनाना चाहती थी।

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